नजफगढ़, रविवार 27 फरवरी 2011.
दुsमन की गोलियों का हम सामना करेंगे आजाद ही रहे हैं आजाद ही रहेंगे
वह आजाद था.... उसने भारतमाता को अंग्रेजों से आजाद कराने का सपना देखा था। अस्सी वर्S पहले 27 फरवरी 1931 के दिन चन्द्रsheखर आजाद अपने एक पुराने मित्र से मिलने जा रहे थे तभी अंग्रेजों की पुलिस पार्टी ने उन्हे घेर लिया। आजाद ने डटकर उनका मुकाबला किया और अन्त में जब उनके रिवाल्वर में अंतिम एक गोली बची थी वह चारों ओर से घिर चुके थे, आजाद ने प्रण लिया कि मैं किसी भी कीमत पर जिन्दा अग्रेंजो के हाथ नही आउंगा और उसी अंतिम गोली से स्वयं को समाप्त कर भारतमाता की आजादी के लिए Shहीद हो गये ...........। उनके इस बलिदानी क्षणों को याद करते हुए हिन्दू मंच जिला नाहरगढ़ (नजफगढ़) के कार्यकर्ताओं ने एक विSHAL पद यात्रा के जरिए आमजनों में प्रायः लुप्त होती जा रही राsट्रभावना, राsट्रभक्ति, राsट्र संवेदना को जगाने का प्रयास किया। लगभग 6 से 7 सौ स्थानीय युवा हिन्दू मंच के झण्डे लिए जीप पर भव्य रूप से सजायी गई भारतमाता, Shहीद चन्द्रsheखर आजाद और महर्SHI दयानन्द की सवारी के आगे-पीछे देesh पर मर मिटने वाले Shहीदों की जय-जयकार करते हुए चल रहे थे। पद यात्रा बुध बाजार से आरम्भ होकर दिल्ली गेट, छावला बस अड्डा, ढांसा बस अड्डा, बहादुरगढ़ बस अड्डा, नांगलोई बस अड्डे से वापस दिल्ली गेट होते हुए हनुमान मन्दिर पर समाप्त हुई। जहां हिन्दू मंच दिल्ली प्रान्त के अध्यक्ष श्री जय भगवान जी ने Shहीदों की जीवनी पर प्रकाSH डालते हुए लोगों से आह्ावान करते हुए कहा हम सभी को देesh के बारे में सोचना चाहिए। पहले हमारा देesh है, हमारी मातृभूमि है। हमें हमारे देesh के Shहीदों से सीख लेनी चाहिए। किस प्रकार उनमें देeshभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा होता था। उसी जज्बे ने हमें आजादी दिलायी। आज गायब होते
जा रहे देeshभक्ति के जज्बे के कारण ही देesh में लूट पड़ गई है। नेता मन्त्री से लेकर सन्त्री तक सभी लूट में Sामिल हैं। उन्होने दुनियां के छोटे से देesh इजरायल के बारे में बताया कि वहां बड़ों से बच्चें तक सभी सैनिक है। वह किस प्रकार चारों तरफ से मुस्लिम देesh से घिरे होने के बावजूद अपनी रक्षा करते हुए उन पर भारी पड़ते हैं। उसके बाद प्रान्त मन्त्री सुsheल तौमर, पSिचमी विभाग के अध्यक्ष मुनshi लाल गुप्ता, विभागमन्त्री सुमेर सिंह ने भी युवाओं को सम्बोधित कर देesh पर Shहीद होने वाले Shहीदों से देeshभक्ति की प्ररेणा लेने का संदेSH दिया। अंत में विभाग अध्यक्ष मुनshi लाल गुप्ता ने हिन्दू मंच नाहरगढ़ जिला के अध्यक्ष राकेSH त्ज्ञए
जिला मन्त्री दीपक भारद्वाज, सह जिला मंत्री SHक्ति डबास, उपाध्यक्ष मयंक पाराSHर, कोSHAध्यक्ष डालचन्द अग्रवाल, जिला प्रभारी अजय रावता, सलाहकार दिगविजय, नगर प्रभारी सुरेन्द्र वत्स, प्रवक्ता राजपाल संगोई
व सभी युवा कार्यकर्ताओं को धन्यवाद करते हुए भारतमाता की जय, SHहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले के उद्घGHOS के साथ पद यात्रा की समाप्ती की घोSणा की। .
रविवार, 27 फ़रवरी 2011
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
जहां 100 में से 90 बेईमान हैं, फिर भी मेरा भारत महान है
बेईमानों की भी हो जनगणना
जहां 100 में से 90 बेईमान हैं, फिर भी मेरा भारत महान है
आजादी के बाद से ही यह कौेतुहल का विsaय रहा है कि भारत में कितने प्रतिsaत लोग बेईमान हैं ? प्रत्येक आदमी के पास अपने-अपने आंकड़े हैं...लेकिन हद तो तब हो गई जब भारत सरकार के अटोर्नी जनरल वाहनवती ने स्वयं अपने मुखारविन्द से सर्वोच्च न्यायालय में भारत के लोगों पर आरोप लगाया था कि भारत की Saत-प्रतिsaत जनता बेईमान हो गई है, इसका सीधा-सीधा मतलब ये निकला कि वाहनवती भी बेईमान हुए ? उनके इस आरोप ने इस बहस को और भी तेज किया....और एक नई
दिsha भी मिली ...चूंकि राजीव गांधी के समय में 10 प्रतिsaत ईमानदार ही देesh में बचे हुए थे इसलिए राजीव गांधी ने संसद में स्वीकार किया था कि दिल्ली से चले पैसे का मात्र 10 प्रति’ात ही जनता तक पहूंच पाता है। यह भी उनका अनुमान ही था, क्योंकि इस सम्बन्ध में सरकार के पास भी कोई विsवस्त आंकड़ें नही थे। हालांकि फिर भी राजीव ने ‘मेरा भारत महान’ का नारा दिया और पहले भूतपूर्व बाद में अभूतपूर्व हो गए। इसके कुछ दिनों बाद ही ‘‘यASHवन्त’’ फिल्म में नाना पाटेकर ने भी इसकी पुsटee की कि 100 में से 90 भारतीय बेईमान हैं फिर भी भारत महान है.....अब वर्तमान काल में कितना प्रतिsaत पैसा जनता तक पहूंच पा रहा है यह पता करने का सरकार ने कोई प्रयास नही किया है और न ही प्रधानमन्त्री ने लम्बे समय से इस सम्बन्ध में कोई बयान ही दिया है। अगर भारत सरकार के अटोर्नी जनरल के बयान को ही सच मानें
तो फिर जनता तक एक भी पैसा नहीं पहूंचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नही पा रहा ह........इसलिए सरकार को यह पता लगाने के लिए कि देesh में कितने लोग बेईमान और कितने लोग ईमानदार हैं इसके लिए बेईमानी को भी जनगणना में shaमिल करना चाहिए ...इससे सबसे पहला
फायदा तो यह होगा कि यह अनुमान लगाने की सुविधा होगी कि योजनाओं में
कितनी रupya जनता तक पहूंच पा रहa है....चूंकि ईमानदारों का प्रतिshaत और जनता तक पहुंचे धन का प्रतिsaत समानुपाती होता है। इसलिए सरकार को यह मालूम हो जाने के बाद अलग से घोटालों
की राshi का प्रावधान कर सकेगी। इस जनगणना में मैं बेईमानों की ग्रेडिंग की अनुसंsha करता हूं ए.बी.सी.डी आदि में।
इसका अपना लाभ होगा। जिस पद के लिए जिस श्रेणी का बेईमान चाहिए, उस पद के लिए उसी श्रेणी के बेईमान की नियुक्ति की जा सकेगी।
जैसे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों के लिए, दूरसंचार मन्त्री के लिए आसानी से ‘ए’ ग्रेड के बेईमान ढूंढे जा सकेंगे। इसके साथ होshiयार और मूर्ख बेईमानों की भी अलग-अलग श्रेणी बनानी पड़ेंगी। होshiयार बेईमानों में उन्हे shaमिल किया जाना चाहिए जो घोटाला करने के बावजूद मामले को उजागर न होने देने में माहिर हों! आज देesh को ऐसे बेईमानों की सख्त जरूरत है, वैसे भी इसका सबसे ज्यादा लाभ स्वयं कांग्रेस को ही होगा क्योंकि उसके Shaसन में ही सबसे ज्यादा घोटाले होते हैं।
वैसे मूर्ख बेईमानों के मन्त्री बन जाने से प्रतिदिन ही कोई न कोई घोटाला प्रकाsh में आता जाता है जिससे सरकार की किरकिरी पर किरकिरी होती जा रही है। वैसे तो हमारी सरकारें किरण बेदी, सत्येन्द्र दूबे और अभयानन्द जैसे ईमानदारों को पहले से ही उनकी ईमानदारी के लिए दण्डित करती रही है...लेकिन जनगणना के बाद ईमानदारों को और भी आसानी से चिन्हित करके दण्डित किया जा सकेगा ...इसके साथ ही सरकार को उत्कृsट कोटि के बेईमानों के लिए बेईमान विभूshण, बेईमान भूshण, बेईमान श्री पुरुस्कार देने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे लाभ ये होगा कि ईमानदार अपनी ईमानदारी भरी व्यवस्था विरोधी गतिविधियों के प्रति हतोत्साहित होंगे और भारत को पूरी दुनियां में प्रथम shaत-प्रतिshaत बेईमान देesh
बनने का गौरव प्राप्त हो सकेगा। इसके साथ ही ईमानदारों के लिए कठोर कानून बनाया जाना चाहिए जिससे कोई भूलकर भी ईमानदारी पर चलने की गलती कर सके। लोकतन्त्र बहुमत से चलता है, बेईमानों को भी अपनी जनसंख्या के आधार पर सत्ता में भागीदारी मिले।
By : Harendar Singhal, Najafgarh
जहां 100 में से 90 बेईमान हैं, फिर भी मेरा भारत महान है
आजादी के बाद से ही यह कौेतुहल का विsaय रहा है कि भारत में कितने प्रतिsaत लोग बेईमान हैं ? प्रत्येक आदमी के पास अपने-अपने आंकड़े हैं...लेकिन हद तो तब हो गई जब भारत सरकार के अटोर्नी जनरल वाहनवती ने स्वयं अपने मुखारविन्द से सर्वोच्च न्यायालय में भारत के लोगों पर आरोप लगाया था कि भारत की Saत-प्रतिsaत जनता बेईमान हो गई है, इसका सीधा-सीधा मतलब ये निकला कि वाहनवती भी बेईमान हुए ? उनके इस आरोप ने इस बहस को और भी तेज किया....और एक नई
दिsha भी मिली ...चूंकि राजीव गांधी के समय में 10 प्रतिsaत ईमानदार ही देesh में बचे हुए थे इसलिए राजीव गांधी ने संसद में स्वीकार किया था कि दिल्ली से चले पैसे का मात्र 10 प्रति’ात ही जनता तक पहूंच पाता है। यह भी उनका अनुमान ही था, क्योंकि इस सम्बन्ध में सरकार के पास भी कोई विsवस्त आंकड़ें नही थे। हालांकि फिर भी राजीव ने ‘मेरा भारत महान’ का नारा दिया और पहले भूतपूर्व बाद में अभूतपूर्व हो गए। इसके कुछ दिनों बाद ही ‘‘यASHवन्त’’ फिल्म में नाना पाटेकर ने भी इसकी पुsटee की कि 100 में से 90 भारतीय बेईमान हैं फिर भी भारत महान है.....अब वर्तमान काल में कितना प्रतिsaत पैसा जनता तक पहूंच पा रहा है यह पता करने का सरकार ने कोई प्रयास नही किया है और न ही प्रधानमन्त्री ने लम्बे समय से इस सम्बन्ध में कोई बयान ही दिया है। अगर भारत सरकार के अटोर्नी जनरल के बयान को ही सच मानें
तो फिर जनता तक एक भी पैसा नहीं पहूंचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नही पा रहा ह........इसलिए सरकार को यह पता लगाने के लिए कि देesh में कितने लोग बेईमान और कितने लोग ईमानदार हैं इसके लिए बेईमानी को भी जनगणना में shaमिल करना चाहिए ...इससे सबसे पहला
फायदा तो यह होगा कि यह अनुमान लगाने की सुविधा होगी कि योजनाओं में
कितनी रupya जनता तक पहूंच पा रहa है....चूंकि ईमानदारों का प्रतिshaत और जनता तक पहुंचे धन का प्रतिsaत समानुपाती होता है। इसलिए सरकार को यह मालूम हो जाने के बाद अलग से घोटालों
की राshi का प्रावधान कर सकेगी। इस जनगणना में मैं बेईमानों की ग्रेडिंग की अनुसंsha करता हूं ए.बी.सी.डी आदि में।
इसका अपना लाभ होगा। जिस पद के लिए जिस श्रेणी का बेईमान चाहिए, उस पद के लिए उसी श्रेणी के बेईमान की नियुक्ति की जा सकेगी।
जैसे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों के लिए, दूरसंचार मन्त्री के लिए आसानी से ‘ए’ ग्रेड के बेईमान ढूंढे जा सकेंगे। इसके साथ होshiयार और मूर्ख बेईमानों की भी अलग-अलग श्रेणी बनानी पड़ेंगी। होshiयार बेईमानों में उन्हे shaमिल किया जाना चाहिए जो घोटाला करने के बावजूद मामले को उजागर न होने देने में माहिर हों! आज देesh को ऐसे बेईमानों की सख्त जरूरत है, वैसे भी इसका सबसे ज्यादा लाभ स्वयं कांग्रेस को ही होगा क्योंकि उसके Shaसन में ही सबसे ज्यादा घोटाले होते हैं।
वैसे मूर्ख बेईमानों के मन्त्री बन जाने से प्रतिदिन ही कोई न कोई घोटाला प्रकाsh में आता जाता है जिससे सरकार की किरकिरी पर किरकिरी होती जा रही है। वैसे तो हमारी सरकारें किरण बेदी, सत्येन्द्र दूबे और अभयानन्द जैसे ईमानदारों को पहले से ही उनकी ईमानदारी के लिए दण्डित करती रही है...लेकिन जनगणना के बाद ईमानदारों को और भी आसानी से चिन्हित करके दण्डित किया जा सकेगा ...इसके साथ ही सरकार को उत्कृsट कोटि के बेईमानों के लिए बेईमान विभूshण, बेईमान भूshण, बेईमान श्री पुरुस्कार देने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे लाभ ये होगा कि ईमानदार अपनी ईमानदारी भरी व्यवस्था विरोधी गतिविधियों के प्रति हतोत्साहित होंगे और भारत को पूरी दुनियां में प्रथम shaत-प्रतिshaत बेईमान देesh
बनने का गौरव प्राप्त हो सकेगा। इसके साथ ही ईमानदारों के लिए कठोर कानून बनाया जाना चाहिए जिससे कोई भूलकर भी ईमानदारी पर चलने की गलती कर सके। लोकतन्त्र बहुमत से चलता है, बेईमानों को भी अपनी जनसंख्या के आधार पर सत्ता में भागीदारी मिले।
By : Harendar Singhal, Najafgarh
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
ताजमहल मकबरा नहीं बल्कि हिन्दूओं के अराध्य भगवान SHIव का ‘तजोमहालय’ था....
सारी दुनियां आजतक इस धोखे में है कि आगरा में स्थित ताजमहल को मुगल बादshaह Saहजहां ने बनवाया था।
तथ्यों से परे यह कोरा झूठ है...... यह उस वक्त के चापलूस इतिहासकारों द्वारा बादshaह Saहजहां की चापलूसी
में गढ़ी गई मुमताज और Saहजहां की प्रेम कहानी झूठी थी।
आगरा का ताजमहल वास्तव में हिन्दूओं के अराध्य देव भगवान Shiव का ‘तजोमहालय Shiवालय’ था! इस तजोमहालय Shiवालय की भव्य सुन्दरता को देखकर Shaहजहां ने अवैध तरीके से जयपुर के तत्कालीन महाराज से छीनकर कब्जा कर लिया.....और........
उस वक्त Shaहजहां के दरबारी लेखक ‘‘ मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ’’ ने अपने ‘‘बादshaहनामा’’ में मुगल बादshaह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से अधिक पन्नो में लिखा है.....जिसके खण्ड एक के पृsठ संख्या 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि ‘’Shaहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी जिसे मृत्यु के बाद बुरहानपुर (मध्यप्रदेSH) में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख 15. जमदी-उल-अउवल दिन Shuक्रवार के दिन अकबराबाद (आगरा) लाया गया....फिर उसे जयपुर के महाराजा जयसिंह से छीन ली गयी इस Shaनदार इमारत (तजोमहालय) में पुनः दफनाया गया। ‘‘मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल (तजोमहालय) से बेहद प्यार करते थे.. पर बादshaह के दवाब के आगे वह इसे देने को तैयार हो गये... इस बात की पुsटी के लिए आज भी राजा जयसिंह के गुप्त संग्रह में वे आदेsh रक्खे हुए हैं
जो Shaहजहां द्वारा ‘तजोमहालय’ भवन को समर्पित करने के लिए बादshaह ने राजा जयसिंह को दिए थे।
....यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम Shaसकों के समय में उनके कुनबे और दरबारियों के लोगों के मरने के बाद
उन्हे दफनाने के लिए....छीनकर कब्जे में लिए गए हिन्दू मन्दिरों और भवनो का प्रयोग किया जाता था।
हुमायूं , अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग जैसे मुगल बादshaह भी एैसे भवनों में ही दफनाये गए हैं....
प्रो. ओक ने भी अपनी खोज में लिखा कि ‘महल’ ‘ाब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक, किसी भी
मुस्लिम देesh में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता है...
यहां यह बात भी झूठी लगती है कि ‘महल’ ‘ाब्द मुमताज महल से लिया गया है
इसके लिए पहली बात यह है कि......Shaहजहां कि पत्नी का नाम मुमताज महल था ही नही ..बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-जमानी था... दूसरी बात ......कि किसी भी भवन का नामकरण.. किसी महिला के नाम पर रखने के लिए मुमताज का नाम ‘मुम’ को छोड़ ‘ताज’ का प्रयोग करने का क्या तुक है...जो नाम का आधा भाग है....! प्रो. ओक के अनुसार आज का ताजमहल हिन्दूओं के अराध्य स्थान तजोमहालय (भगवान Shiव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। इस तरह प्रो. ओक के अलावा भी दुनियां भर के अनेक इतिहासकार इसी बात प्रत्यक्ष समर्थन करते हैं। भगवान Shiव का मन्दिर (तजोमहालय) यानि आज का ताजमहल मुगल बादshaह के युग से लगभग 300 वर्S पहले से ही था, जो आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था।
--- न्यूयार्क के पुरात्वविद प्रोफेसर मर्विन मिलर ने 1985 में ताजमहल के यमुना की तरफ के दरवाजे की लकड़ी
पर जमी हुई कार्बन डेन्टिग के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि यह दरवाजा सन् 1359 ईस्वी के आस-पास
का बना हुआ है। जबकि उस वक्त मुगलों का नामों-निshaन भी नहीं था। और मुमताज की मृत्यु 1631 ईस्वी में
हुई थी। उसी वर्S 1631 में एक अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी के लेख में भी इस बात का पुरजोर समर्थन है कि
ताजमहल मुगल बादshaह के पहले अति महत्वपूर्ण भवन था।
झझझ इसी तरह एक फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी. जो औेरंगजेब के काल में भारत आया था और
10 year's तक रहा......उसने अपने विवरण में लिखा कि औरंगजेब काल में ही इस तरह का झूठ फैलाया गया कि ताजमहल तो Shaहजहां ने बनवाया था......
प्रोफेसर ओक ने अनेक आकृतियों और Shiल्प सम्बन्धी असंगताओं को जांच-परख कर साबित किया कि ताज
महल कोई मकबरा नही बल्कि हिन्दूओं का अराध्य Shiव मन्दिर ही है जिसे बल पूवर्क मुगल बादshaह Shaहजहां ने मकबरे का रूप दिया। आज भी ताजमहल के अनेको कमरे Shaहजहां के समय से ही बन्द पड़े हैं....जो आम जनता की पहुंच से परे हैं।
प्रोफेसर ओक के अनुसार हिन्दू मन्दिरों में ही पूजा व धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान Shiव की मूर्ति, त्रिshuल,
कलsh और ऊँ आदि होते हैं .....प्रयोग किये जाते हैं.... कहा जाता है कि ताजमहल में मुमताज की कब्र पर हर समय बूंद बूंद कर पानी टपकता रहता है.....यदि एैसा है तो पूरी दुनियां में किसी की भी कब्र पर बूंद बूंद पानी नही टपकाया जाता.......जबकि प्रत्येक हिन्दू Shiव मन्दिर में ही Shiव लिंग पर बूंद बूंद कर पानी टपकाने की
व्यवस्था की जाती है, फिर ताजमहल में मकबरे के उपर बूंद बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब है ???????
राजनीतिक भत्र्सना व देesh के मुस्लिम वोटो की लालच या उनके कोप भाजन के डर से इंदिरा गांधी ने प्रोफेसर
पी. एन. ओक को भयंकर परिणाम भुगतने की धमकी के साथ उनकी सभी पुस्तकों को तत्काल जब्त कर लिया
था। अगर प्रोफेसर पी. एन. ओक का ‘ताजमहल ’ अनुसंधान गलत था तो क्यों नही वर्तमान केन्द्र सरकार
ताजमहल के बन्द पड़े कमरों को संयुक्त राsट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए.....और अन्र्तराsट्रीय विsesyaज्ञों को छानबीन करने दे ....... जरा सोचिए !!!!!!!! इस संगमरमरी आर्कshaण वाले तजोमहालय (ताजमहल) को बनवाने का श्रेय बाहर से आने वाले हमलावर मुगल बादshaह Shaहजहां को क्यों ????
जबकि इसको बनवाने का सच्चा श्रेय और नाम तो जयपुर के महाराजा जयसिंह को जाना चाहिए .......
ताजमहल की छुपी हुई सच्चाई यही है कि ये मुमु का मकबरा नही बल्कि हिन्दू राजपूतों का अराध्य स्थल Shiवालय ‘तजोमहालय’ है ..........
Shiवधाम पर लिटाया..तो Shiव बूंदे आंसू बन गईं,
रूह तड़प-तड़प कर आजतक.. अगान्तुकों से लिपट रही......
तथ्यों से परे यह कोरा झूठ है...... यह उस वक्त के चापलूस इतिहासकारों द्वारा बादshaह Saहजहां की चापलूसी
में गढ़ी गई मुमताज और Saहजहां की प्रेम कहानी झूठी थी।
आगरा का ताजमहल वास्तव में हिन्दूओं के अराध्य देव भगवान Shiव का ‘तजोमहालय Shiवालय’ था! इस तजोमहालय Shiवालय की भव्य सुन्दरता को देखकर Shaहजहां ने अवैध तरीके से जयपुर के तत्कालीन महाराज से छीनकर कब्जा कर लिया.....और........
उस वक्त Shaहजहां के दरबारी लेखक ‘‘ मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ’’ ने अपने ‘‘बादshaहनामा’’ में मुगल बादshaह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से अधिक पन्नो में लिखा है.....जिसके खण्ड एक के पृsठ संख्या 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि ‘’Shaहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी जिसे मृत्यु के बाद बुरहानपुर (मध्यप्रदेSH) में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख 15. जमदी-उल-अउवल दिन Shuक्रवार के दिन अकबराबाद (आगरा) लाया गया....फिर उसे जयपुर के महाराजा जयसिंह से छीन ली गयी इस Shaनदार इमारत (तजोमहालय) में पुनः दफनाया गया। ‘‘मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल (तजोमहालय) से बेहद प्यार करते थे.. पर बादshaह के दवाब के आगे वह इसे देने को तैयार हो गये... इस बात की पुsटी के लिए आज भी राजा जयसिंह के गुप्त संग्रह में वे आदेsh रक्खे हुए हैं
जो Shaहजहां द्वारा ‘तजोमहालय’ भवन को समर्पित करने के लिए बादshaह ने राजा जयसिंह को दिए थे।
....यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम Shaसकों के समय में उनके कुनबे और दरबारियों के लोगों के मरने के बाद
उन्हे दफनाने के लिए....छीनकर कब्जे में लिए गए हिन्दू मन्दिरों और भवनो का प्रयोग किया जाता था।
हुमायूं , अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग जैसे मुगल बादshaह भी एैसे भवनों में ही दफनाये गए हैं....
प्रो. ओक ने भी अपनी खोज में लिखा कि ‘महल’ ‘ाब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक, किसी भी
मुस्लिम देesh में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता है...
यहां यह बात भी झूठी लगती है कि ‘महल’ ‘ाब्द मुमताज महल से लिया गया है
इसके लिए पहली बात यह है कि......Shaहजहां कि पत्नी का नाम मुमताज महल था ही नही ..बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-जमानी था... दूसरी बात ......कि किसी भी भवन का नामकरण.. किसी महिला के नाम पर रखने के लिए मुमताज का नाम ‘मुम’ को छोड़ ‘ताज’ का प्रयोग करने का क्या तुक है...जो नाम का आधा भाग है....! प्रो. ओक के अनुसार आज का ताजमहल हिन्दूओं के अराध्य स्थान तजोमहालय (भगवान Shiव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। इस तरह प्रो. ओक के अलावा भी दुनियां भर के अनेक इतिहासकार इसी बात प्रत्यक्ष समर्थन करते हैं। भगवान Shiव का मन्दिर (तजोमहालय) यानि आज का ताजमहल मुगल बादshaह के युग से लगभग 300 वर्S पहले से ही था, जो आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था।
--- न्यूयार्क के पुरात्वविद प्रोफेसर मर्विन मिलर ने 1985 में ताजमहल के यमुना की तरफ के दरवाजे की लकड़ी
पर जमी हुई कार्बन डेन्टिग के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि यह दरवाजा सन् 1359 ईस्वी के आस-पास
का बना हुआ है। जबकि उस वक्त मुगलों का नामों-निshaन भी नहीं था। और मुमताज की मृत्यु 1631 ईस्वी में
हुई थी। उसी वर्S 1631 में एक अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी के लेख में भी इस बात का पुरजोर समर्थन है कि
ताजमहल मुगल बादshaह के पहले अति महत्वपूर्ण भवन था।
झझझ इसी तरह एक फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी. जो औेरंगजेब के काल में भारत आया था और
10 year's तक रहा......उसने अपने विवरण में लिखा कि औरंगजेब काल में ही इस तरह का झूठ फैलाया गया कि ताजमहल तो Shaहजहां ने बनवाया था......
प्रोफेसर ओक ने अनेक आकृतियों और Shiल्प सम्बन्धी असंगताओं को जांच-परख कर साबित किया कि ताज
महल कोई मकबरा नही बल्कि हिन्दूओं का अराध्य Shiव मन्दिर ही है जिसे बल पूवर्क मुगल बादshaह Shaहजहां ने मकबरे का रूप दिया। आज भी ताजमहल के अनेको कमरे Shaहजहां के समय से ही बन्द पड़े हैं....जो आम जनता की पहुंच से परे हैं।
प्रोफेसर ओक के अनुसार हिन्दू मन्दिरों में ही पूजा व धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान Shiव की मूर्ति, त्रिshuल,
कलsh और ऊँ आदि होते हैं .....प्रयोग किये जाते हैं.... कहा जाता है कि ताजमहल में मुमताज की कब्र पर हर समय बूंद बूंद कर पानी टपकता रहता है.....यदि एैसा है तो पूरी दुनियां में किसी की भी कब्र पर बूंद बूंद पानी नही टपकाया जाता.......जबकि प्रत्येक हिन्दू Shiव मन्दिर में ही Shiव लिंग पर बूंद बूंद कर पानी टपकाने की
व्यवस्था की जाती है, फिर ताजमहल में मकबरे के उपर बूंद बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब है ???????
राजनीतिक भत्र्सना व देesh के मुस्लिम वोटो की लालच या उनके कोप भाजन के डर से इंदिरा गांधी ने प्रोफेसर
पी. एन. ओक को भयंकर परिणाम भुगतने की धमकी के साथ उनकी सभी पुस्तकों को तत्काल जब्त कर लिया
था। अगर प्रोफेसर पी. एन. ओक का ‘ताजमहल ’ अनुसंधान गलत था तो क्यों नही वर्तमान केन्द्र सरकार
ताजमहल के बन्द पड़े कमरों को संयुक्त राsट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए.....और अन्र्तराsट्रीय विsesyaज्ञों को छानबीन करने दे ....... जरा सोचिए !!!!!!!! इस संगमरमरी आर्कshaण वाले तजोमहालय (ताजमहल) को बनवाने का श्रेय बाहर से आने वाले हमलावर मुगल बादshaह Shaहजहां को क्यों ????
जबकि इसको बनवाने का सच्चा श्रेय और नाम तो जयपुर के महाराजा जयसिंह को जाना चाहिए .......
ताजमहल की छुपी हुई सच्चाई यही है कि ये मुमु का मकबरा नही बल्कि हिन्दू राजपूतों का अराध्य स्थल Shiवालय ‘तजोमहालय’ है ..........
Shiवधाम पर लिटाया..तो Shiव बूंदे आंसू बन गईं,
रूह तड़प-तड़प कर आजतक.. अगान्तुकों से लिपट रही......
सदस्यता लें
संदेश (Atom)