भारत में मृत हो चुके योग और प्राणायाम को पूरी दुनियां में प्रतिSिठत करने वाले बाबा रामदेव जिसके द्वारा दुनियां भर के 5 करोड़ से ज्यादा लोग स्वस्थ्य लाभ ले चुके हैं, अनुयायी हैं। यहां तक कि मिडिल ईस्ट के
मुस्लिम देSHO के लोग भी छुप-छुपकर योग-प्राणयाम करते हैं और किसी भी पेैथी के द्वारा ठीक न होने वाली बीमारियों से उन्होने मुक्ति पायी है। करोड़ों को स्वस्थ्य दान करने वाले बाबा रामदेव अगर आज यूरोप और
अमेरिका के होते तो निःसंदेह उन्हे नोबेल पुरूSकार कब का मिल गया होता। आज से 10 वर्SH पहले तक हमारी भारतीयता, हमारे सनातनी ज्ञान, संस्कृति और हमारे प्राचीन योग और औSाधि ज्ञान को दुनियां भर
में दिव्य स्वरूप में प्रतिSिठत होने के बारे में, इस उत्थान के बारे में किसी ने भी SHAयद ही सोचा होगा! इससे पहले सभी लोगों को सिर्फ और सिर्फ स्वामी विवेकानन्द ही याद आते थे जब उनके 1896 में ’िSकागो धर्मसभा में भारतीय ज्ञान और योग पर ऐतिहासिक उद्धबोधन का। आज 105 साल बाद जब उसी पताका को एक सन्यासी पूरी भारतीयता के साथ पूरे विSव में लहराने मे लगा है तो हमारे देesh के ही भ्रSट, डरपोक, कायर, राSट्रद्रोही मुस्लिम वोटों की राजनीति करने के लिए अफजल गुरूओं को दामादों की तरह पालने वाली, बाटला हाउस के SHहीदों को कलंकित करने वाली, मुम्बई हमले के आतंकियों को हिन्दू साबित करने वाली, देESH को लूट-लूटकर, निचोड़ कर विदेSHो में खरबों-खरबों डाॅलर जमा करने वाली कांग्रेस ने अपने भ्रSटाचारी आचरण पर जेपीसी की खीज उतारने के लिए बाबा रामदेव नाम के खम्भे को नोचना SHुरू कर दिया है।
क्योंकि बाबा रामदेव ने 2009 के चुनावो से पहले ही कालेधन का मुद्दा उठाना SHुरू कर दिया था। स्वामी रामदेव का कसूर सिर्फ इतना है कि वह योग के प्रसार के साथ-साथ भ्रSट राजनीति के कीचड़ भरें तालाब को भी साफ कर देना चाहते है। जबकि कांग्रेस बाबा रामदेव को एक भ्रSट सन्यासी करार देने पर उतारू है। राजनीति के घाघ और भ्रSटों को अच्छी तरह से पता है कि जब-जब कोई सन्यासी चाणक्य या गांधी बनकर राजनीति में धंसा है तब-तब देESH में भ्रSट राजनीति का समूल नाSH हुआ है। उनपर आरोप लगाए जाते हैं कि उनका योग सिर्फ अमीरों के लिए है, गरीबों के लिए नही। SHायद वे ये नही जानते कि बाबा रामदेव ने एक लाख से अधिक योग SHIiक्षकों को प्रSिSक्षण देकर भारत के कोने-कोने में योग के प्रचार प्रसार करने और गरीब भारतवासियों को स्वास्थ्य धन देने के लिए भेजा हुआ है। बाबा रामदेव के स्वदेSHI से प्रेरित होकर आज लाखों भारतीय विदेSHI उत्पादों का बहिSकार कर देESH की अरबो रूपयों की विदेSHI मुद्रा बचा रहे हैं।
महात्मा गांधी के बाद अगर खादी के लिए किसी ने आन्दोलन किया है तो वह स्वर्गीय राजीव दीक्षित और बाबा रामदेव ही हैं। जिनकी वजह से आज लाखों लोग खादी द्वारा गृह उद्यौग चलाकर रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। उनपर आरोप लगाने वालों को पता नही कि बाबा रामदेव की देSHI दवाईयों के कारण विदेSHI दवाई कम्पनियों को हर साल अरबों डालर का चूना लगता है। विदेSHO को जाने वाले यह धन देESH के विकास में काम आता है। क्या स्वदेSHी, भारत की प्राचीन योग परम्परा और देSHप्रेम की बात करना भारत में अपराध है? क्या राजनीति में प्रवेS सिर्फ माफियाओं, अपराधियों, धनपSHुओं और नेताओं की बिगड़ी हुई औलादों के लिए ही आरक्षित है ? क्या संविधान में सिविल और डेमोक्रेटिक अधिकारों को मिटा दिया गया है जो
प्रत्येक भारतवासी को प्राप्त है? क्या स्वामी बाबा रामदेव भारत के नागरिक नहीं हैं ? क्यों भारत के लोग मात्र दस कक्षा पास रहस्यमयी सोनियां के चरणों की धूल को नतमस्तक पर लगाने को उत्सुक रहते हैं ?
इस देESH से राSट्रीयता का ह्नास क्यों होता जा रहा है ? स्वामी रामदेव का कसूर सिर्फ इतना है कि उन्होने 21वीं सदी के राजाराम मोहन राय की तरह, ईSवर चन्द विद्यासागर की तरह, दयानन्द सरस्वती की तरह,
स्वामी विवेकानन्द की तरह ही सनातनी भारत को विSव गुरू बनाने का सपना देखा। जिसको साकार करने के लिए वे मनोयोग से कर्म करते हुए नित्य प्रतिदिन प्रगति के पथ पर हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब
किसी युगमानव ने दे’ा और समाज को बदलने का बीड़ा उठाया है तब-तब ही सुख सुविधा से सम्पन्न सड़-गले सुविधाभोगियों द्वारा ही विरोध किया गया! SHaयद हमारे देESH की सत्ता में बैठे लोगों के कान इतने
बहरे हो गये हैं जिन्हे मिस्र, ट्यूनिSHIया, लिबिया और दुनियां के दूसरे देSHO में उठते बदलाव की पुकार भी सुनाई नही पड़ रही! इसका एकमात्र कारण यही है कि वह देESH के लोगों के धन को हड़पकर प्राप्त की गईं
सुख-सुविधाभोगी कीचड़ में पिल-पिला रहे हैं जिन्हे भारत के गरीबों से कुछ लेना-देना नही। उन्हे हमारे देESH की बेरोजगारी से पनप रहे विद्रोह, गरीबों की भूख से निकलती आह, आत्महत्या करते किसान, दूध के लिए
बिलखते बच्चों के लिए सरेआम बिकती मांए नहीं दिखतीं! जंगलों से बेदखल होते आदिवासी और उनको हथियार पकड़ा कर नक्सली बनाते देESHद्रोही कम्यूनिस्ट नही दिखते! इनको यूएनओ का मानव विकास
सूचकांक भी नही दिखाई पड़ रहा जिसमें भारत देESH सबसे अंतिम श्रेणी में खड़ा है जबकि मानव विकास में भूटान, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान जेैसे देESH हमसे आगे खड़े हैं। SHAयद हमारी सरकार और प्रधानमन्त्री
अपने कार्यकाल में प्रोफेसर अर्जुन सेन गुप्ता की 2006 की रिर्पोट को पढ़कर भूल गये है जिसमें कहा गया कि भारत के अस्सी करोड़ लोगों की प्रतिदिन की आमदनी 20 रूपये या इससे कम है। आजादी के 64 वर्SOो
बाद से गरीबी बढ़ने की रफ्तार तेजी से बढ़ती जा रही है। जबकि कुछ लोगों द्वारा सत्ता में आते ही देESH के धन को लूटकर अरबों-खरबों जमा कर लिया गया! जबकि अंग्रेज ने भी अपने 175 साल के SHAसन में
1000 अरब डालर धन की लूट की थी। यही हम भारतवासियों का इतिहास है। हमारी कमजोरियों और हमारे दब्बूपने की वजह से सभी न हमें लूटा है और लूट रहे हैं। मुहम्मद गजनवी से लेकर सोनियां गांधी तक।
सोमनाथ मन्दिर से काॅमनवेल्थ, टू जी स्पेक्ट्रम तक। पामोलिन घोटालेबाज पी.जे. थामस को सिर्फ इसलिए सी वी सी का अध्यक्ष बना दिया गया कि वह ईसाई और सोनियां गांधी परिवार का नजदीकी था।
यही परिवार देESH में भ्रSटाचार की मुख्य जड़ है, जिनकी वजह से तमाम सभी प्रकार के भ्रSटाचार और भ्रSटाचारियों का जन्म हुआ। बाबा स्वामी रामदेव का कसूर यही है कि उन्होने इस भ्रSटतम नेहरू, गांधी
परिवार पर उंगलियां उठायीं। जबकि बाबा ने स्वयं ही बता दिया कि मेरे दो ट्रस्ट हैं, जिनकी वार्”Sिाक टर्न ओवर 2200 करोड़ है। जो लाभ नही कागजों में दर्ज टर्नओवर है। जबकि यह रकम बाबा के खिलाफ बोलने
वाले दिग्गी राजा की सम्पति और आय से बहुत कम है। अगर बाबा ने अपना आन्दोलन तेज किया तो निSिचत ही कांग्रेस को सत्ता के साथ उनका विदेSी बैंको में जमा धन से भी हाथ धोना पड़ सकता है।
नजफगढ़ समाचार
बुधवार, 2 मार्च 2011
रविवार, 27 फ़रवरी 2011
दुsमन की गोलियों का हम सामना करेंगे आजाद ही रहे हैं आजाद ही रहेंगे
नजफगढ़, रविवार 27 फरवरी 2011.
दुsमन की गोलियों का हम सामना करेंगे आजाद ही रहे हैं आजाद ही रहेंगे
वह आजाद था.... उसने भारतमाता को अंग्रेजों से आजाद कराने का सपना देखा था। अस्सी वर्S पहले 27 फरवरी 1931 के दिन चन्द्रsheखर आजाद अपने एक पुराने मित्र से मिलने जा रहे थे तभी अंग्रेजों की पुलिस पार्टी ने उन्हे घेर लिया। आजाद ने डटकर उनका मुकाबला किया और अन्त में जब उनके रिवाल्वर में अंतिम एक गोली बची थी वह चारों ओर से घिर चुके थे, आजाद ने प्रण लिया कि मैं किसी भी कीमत पर जिन्दा अग्रेंजो के हाथ नही आउंगा और उसी अंतिम गोली से स्वयं को समाप्त कर भारतमाता की आजादी के लिए Shहीद हो गये ...........। उनके इस बलिदानी क्षणों को याद करते हुए हिन्दू मंच जिला नाहरगढ़ (नजफगढ़) के कार्यकर्ताओं ने एक विSHAL पद यात्रा के जरिए आमजनों में प्रायः लुप्त होती जा रही राsट्रभावना, राsट्रभक्ति, राsट्र संवेदना को जगाने का प्रयास किया। लगभग 6 से 7 सौ स्थानीय युवा हिन्दू मंच के झण्डे लिए जीप पर भव्य रूप से सजायी गई भारतमाता, Shहीद चन्द्रsheखर आजाद और महर्SHI दयानन्द की सवारी के आगे-पीछे देesh पर मर मिटने वाले Shहीदों की जय-जयकार करते हुए चल रहे थे। पद यात्रा बुध बाजार से आरम्भ होकर दिल्ली गेट, छावला बस अड्डा, ढांसा बस अड्डा, बहादुरगढ़ बस अड्डा, नांगलोई बस अड्डे से वापस दिल्ली गेट होते हुए हनुमान मन्दिर पर समाप्त हुई। जहां हिन्दू मंच दिल्ली प्रान्त के अध्यक्ष श्री जय भगवान जी ने Shहीदों की जीवनी पर प्रकाSH डालते हुए लोगों से आह्ावान करते हुए कहा हम सभी को देesh के बारे में सोचना चाहिए। पहले हमारा देesh है, हमारी मातृभूमि है। हमें हमारे देesh के Shहीदों से सीख लेनी चाहिए। किस प्रकार उनमें देeshभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा होता था। उसी जज्बे ने हमें आजादी दिलायी। आज गायब होते
जा रहे देeshभक्ति के जज्बे के कारण ही देesh में लूट पड़ गई है। नेता मन्त्री से लेकर सन्त्री तक सभी लूट में Sामिल हैं। उन्होने दुनियां के छोटे से देesh इजरायल के बारे में बताया कि वहां बड़ों से बच्चें तक सभी सैनिक है। वह किस प्रकार चारों तरफ से मुस्लिम देesh से घिरे होने के बावजूद अपनी रक्षा करते हुए उन पर भारी पड़ते हैं। उसके बाद प्रान्त मन्त्री सुsheल तौमर, पSिचमी विभाग के अध्यक्ष मुनshi लाल गुप्ता, विभागमन्त्री सुमेर सिंह ने भी युवाओं को सम्बोधित कर देesh पर Shहीद होने वाले Shहीदों से देeshभक्ति की प्ररेणा लेने का संदेSH दिया। अंत में विभाग अध्यक्ष मुनshi लाल गुप्ता ने हिन्दू मंच नाहरगढ़ जिला के अध्यक्ष राकेSH त्ज्ञए
जिला मन्त्री दीपक भारद्वाज, सह जिला मंत्री SHक्ति डबास, उपाध्यक्ष मयंक पाराSHर, कोSHAध्यक्ष डालचन्द अग्रवाल, जिला प्रभारी अजय रावता, सलाहकार दिगविजय, नगर प्रभारी सुरेन्द्र वत्स, प्रवक्ता राजपाल संगोई
व सभी युवा कार्यकर्ताओं को धन्यवाद करते हुए भारतमाता की जय, SHहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले के उद्घGHOS के साथ पद यात्रा की समाप्ती की घोSणा की। .
दुsमन की गोलियों का हम सामना करेंगे आजाद ही रहे हैं आजाद ही रहेंगे
वह आजाद था.... उसने भारतमाता को अंग्रेजों से आजाद कराने का सपना देखा था। अस्सी वर्S पहले 27 फरवरी 1931 के दिन चन्द्रsheखर आजाद अपने एक पुराने मित्र से मिलने जा रहे थे तभी अंग्रेजों की पुलिस पार्टी ने उन्हे घेर लिया। आजाद ने डटकर उनका मुकाबला किया और अन्त में जब उनके रिवाल्वर में अंतिम एक गोली बची थी वह चारों ओर से घिर चुके थे, आजाद ने प्रण लिया कि मैं किसी भी कीमत पर जिन्दा अग्रेंजो के हाथ नही आउंगा और उसी अंतिम गोली से स्वयं को समाप्त कर भारतमाता की आजादी के लिए Shहीद हो गये ...........। उनके इस बलिदानी क्षणों को याद करते हुए हिन्दू मंच जिला नाहरगढ़ (नजफगढ़) के कार्यकर्ताओं ने एक विSHAL पद यात्रा के जरिए आमजनों में प्रायः लुप्त होती जा रही राsट्रभावना, राsट्रभक्ति, राsट्र संवेदना को जगाने का प्रयास किया। लगभग 6 से 7 सौ स्थानीय युवा हिन्दू मंच के झण्डे लिए जीप पर भव्य रूप से सजायी गई भारतमाता, Shहीद चन्द्रsheखर आजाद और महर्SHI दयानन्द की सवारी के आगे-पीछे देesh पर मर मिटने वाले Shहीदों की जय-जयकार करते हुए चल रहे थे। पद यात्रा बुध बाजार से आरम्भ होकर दिल्ली गेट, छावला बस अड्डा, ढांसा बस अड्डा, बहादुरगढ़ बस अड्डा, नांगलोई बस अड्डे से वापस दिल्ली गेट होते हुए हनुमान मन्दिर पर समाप्त हुई। जहां हिन्दू मंच दिल्ली प्रान्त के अध्यक्ष श्री जय भगवान जी ने Shहीदों की जीवनी पर प्रकाSH डालते हुए लोगों से आह्ावान करते हुए कहा हम सभी को देesh के बारे में सोचना चाहिए। पहले हमारा देesh है, हमारी मातृभूमि है। हमें हमारे देesh के Shहीदों से सीख लेनी चाहिए। किस प्रकार उनमें देeshभक्ति का जज्बा कूट-कूटकर भरा होता था। उसी जज्बे ने हमें आजादी दिलायी। आज गायब होते
जा रहे देeshभक्ति के जज्बे के कारण ही देesh में लूट पड़ गई है। नेता मन्त्री से लेकर सन्त्री तक सभी लूट में Sामिल हैं। उन्होने दुनियां के छोटे से देesh इजरायल के बारे में बताया कि वहां बड़ों से बच्चें तक सभी सैनिक है। वह किस प्रकार चारों तरफ से मुस्लिम देesh से घिरे होने के बावजूद अपनी रक्षा करते हुए उन पर भारी पड़ते हैं। उसके बाद प्रान्त मन्त्री सुsheल तौमर, पSिचमी विभाग के अध्यक्ष मुनshi लाल गुप्ता, विभागमन्त्री सुमेर सिंह ने भी युवाओं को सम्बोधित कर देesh पर Shहीद होने वाले Shहीदों से देeshभक्ति की प्ररेणा लेने का संदेSH दिया। अंत में विभाग अध्यक्ष मुनshi लाल गुप्ता ने हिन्दू मंच नाहरगढ़ जिला के अध्यक्ष राकेSH त्ज्ञए
जिला मन्त्री दीपक भारद्वाज, सह जिला मंत्री SHक्ति डबास, उपाध्यक्ष मयंक पाराSHर, कोSHAध्यक्ष डालचन्द अग्रवाल, जिला प्रभारी अजय रावता, सलाहकार दिगविजय, नगर प्रभारी सुरेन्द्र वत्स, प्रवक्ता राजपाल संगोई
व सभी युवा कार्यकर्ताओं को धन्यवाद करते हुए भारतमाता की जय, SHहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले के उद्घGHOS के साथ पद यात्रा की समाप्ती की घोSणा की। .
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
जहां 100 में से 90 बेईमान हैं, फिर भी मेरा भारत महान है
बेईमानों की भी हो जनगणना
जहां 100 में से 90 बेईमान हैं, फिर भी मेरा भारत महान है
आजादी के बाद से ही यह कौेतुहल का विsaय रहा है कि भारत में कितने प्रतिsaत लोग बेईमान हैं ? प्रत्येक आदमी के पास अपने-अपने आंकड़े हैं...लेकिन हद तो तब हो गई जब भारत सरकार के अटोर्नी जनरल वाहनवती ने स्वयं अपने मुखारविन्द से सर्वोच्च न्यायालय में भारत के लोगों पर आरोप लगाया था कि भारत की Saत-प्रतिsaत जनता बेईमान हो गई है, इसका सीधा-सीधा मतलब ये निकला कि वाहनवती भी बेईमान हुए ? उनके इस आरोप ने इस बहस को और भी तेज किया....और एक नई
दिsha भी मिली ...चूंकि राजीव गांधी के समय में 10 प्रतिsaत ईमानदार ही देesh में बचे हुए थे इसलिए राजीव गांधी ने संसद में स्वीकार किया था कि दिल्ली से चले पैसे का मात्र 10 प्रति’ात ही जनता तक पहूंच पाता है। यह भी उनका अनुमान ही था, क्योंकि इस सम्बन्ध में सरकार के पास भी कोई विsवस्त आंकड़ें नही थे। हालांकि फिर भी राजीव ने ‘मेरा भारत महान’ का नारा दिया और पहले भूतपूर्व बाद में अभूतपूर्व हो गए। इसके कुछ दिनों बाद ही ‘‘यASHवन्त’’ फिल्म में नाना पाटेकर ने भी इसकी पुsटee की कि 100 में से 90 भारतीय बेईमान हैं फिर भी भारत महान है.....अब वर्तमान काल में कितना प्रतिsaत पैसा जनता तक पहूंच पा रहा है यह पता करने का सरकार ने कोई प्रयास नही किया है और न ही प्रधानमन्त्री ने लम्बे समय से इस सम्बन्ध में कोई बयान ही दिया है। अगर भारत सरकार के अटोर्नी जनरल के बयान को ही सच मानें
तो फिर जनता तक एक भी पैसा नहीं पहूंचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नही पा रहा ह........इसलिए सरकार को यह पता लगाने के लिए कि देesh में कितने लोग बेईमान और कितने लोग ईमानदार हैं इसके लिए बेईमानी को भी जनगणना में shaमिल करना चाहिए ...इससे सबसे पहला
फायदा तो यह होगा कि यह अनुमान लगाने की सुविधा होगी कि योजनाओं में
कितनी रupya जनता तक पहूंच पा रहa है....चूंकि ईमानदारों का प्रतिshaत और जनता तक पहुंचे धन का प्रतिsaत समानुपाती होता है। इसलिए सरकार को यह मालूम हो जाने के बाद अलग से घोटालों
की राshi का प्रावधान कर सकेगी। इस जनगणना में मैं बेईमानों की ग्रेडिंग की अनुसंsha करता हूं ए.बी.सी.डी आदि में।
इसका अपना लाभ होगा। जिस पद के लिए जिस श्रेणी का बेईमान चाहिए, उस पद के लिए उसी श्रेणी के बेईमान की नियुक्ति की जा सकेगी।
जैसे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों के लिए, दूरसंचार मन्त्री के लिए आसानी से ‘ए’ ग्रेड के बेईमान ढूंढे जा सकेंगे। इसके साथ होshiयार और मूर्ख बेईमानों की भी अलग-अलग श्रेणी बनानी पड़ेंगी। होshiयार बेईमानों में उन्हे shaमिल किया जाना चाहिए जो घोटाला करने के बावजूद मामले को उजागर न होने देने में माहिर हों! आज देesh को ऐसे बेईमानों की सख्त जरूरत है, वैसे भी इसका सबसे ज्यादा लाभ स्वयं कांग्रेस को ही होगा क्योंकि उसके Shaसन में ही सबसे ज्यादा घोटाले होते हैं।
वैसे मूर्ख बेईमानों के मन्त्री बन जाने से प्रतिदिन ही कोई न कोई घोटाला प्रकाsh में आता जाता है जिससे सरकार की किरकिरी पर किरकिरी होती जा रही है। वैसे तो हमारी सरकारें किरण बेदी, सत्येन्द्र दूबे और अभयानन्द जैसे ईमानदारों को पहले से ही उनकी ईमानदारी के लिए दण्डित करती रही है...लेकिन जनगणना के बाद ईमानदारों को और भी आसानी से चिन्हित करके दण्डित किया जा सकेगा ...इसके साथ ही सरकार को उत्कृsट कोटि के बेईमानों के लिए बेईमान विभूshण, बेईमान भूshण, बेईमान श्री पुरुस्कार देने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे लाभ ये होगा कि ईमानदार अपनी ईमानदारी भरी व्यवस्था विरोधी गतिविधियों के प्रति हतोत्साहित होंगे और भारत को पूरी दुनियां में प्रथम shaत-प्रतिshaत बेईमान देesh
बनने का गौरव प्राप्त हो सकेगा। इसके साथ ही ईमानदारों के लिए कठोर कानून बनाया जाना चाहिए जिससे कोई भूलकर भी ईमानदारी पर चलने की गलती कर सके। लोकतन्त्र बहुमत से चलता है, बेईमानों को भी अपनी जनसंख्या के आधार पर सत्ता में भागीदारी मिले।
By : Harendar Singhal, Najafgarh
जहां 100 में से 90 बेईमान हैं, फिर भी मेरा भारत महान है
आजादी के बाद से ही यह कौेतुहल का विsaय रहा है कि भारत में कितने प्रतिsaत लोग बेईमान हैं ? प्रत्येक आदमी के पास अपने-अपने आंकड़े हैं...लेकिन हद तो तब हो गई जब भारत सरकार के अटोर्नी जनरल वाहनवती ने स्वयं अपने मुखारविन्द से सर्वोच्च न्यायालय में भारत के लोगों पर आरोप लगाया था कि भारत की Saत-प्रतिsaत जनता बेईमान हो गई है, इसका सीधा-सीधा मतलब ये निकला कि वाहनवती भी बेईमान हुए ? उनके इस आरोप ने इस बहस को और भी तेज किया....और एक नई
दिsha भी मिली ...चूंकि राजीव गांधी के समय में 10 प्रतिsaत ईमानदार ही देesh में बचे हुए थे इसलिए राजीव गांधी ने संसद में स्वीकार किया था कि दिल्ली से चले पैसे का मात्र 10 प्रति’ात ही जनता तक पहूंच पाता है। यह भी उनका अनुमान ही था, क्योंकि इस सम्बन्ध में सरकार के पास भी कोई विsवस्त आंकड़ें नही थे। हालांकि फिर भी राजीव ने ‘मेरा भारत महान’ का नारा दिया और पहले भूतपूर्व बाद में अभूतपूर्व हो गए। इसके कुछ दिनों बाद ही ‘‘यASHवन्त’’ फिल्म में नाना पाटेकर ने भी इसकी पुsटee की कि 100 में से 90 भारतीय बेईमान हैं फिर भी भारत महान है.....अब वर्तमान काल में कितना प्रतिsaत पैसा जनता तक पहूंच पा रहा है यह पता करने का सरकार ने कोई प्रयास नही किया है और न ही प्रधानमन्त्री ने लम्बे समय से इस सम्बन्ध में कोई बयान ही दिया है। अगर भारत सरकार के अटोर्नी जनरल के बयान को ही सच मानें
तो फिर जनता तक एक भी पैसा नहीं पहूंचना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नही पा रहा ह........इसलिए सरकार को यह पता लगाने के लिए कि देesh में कितने लोग बेईमान और कितने लोग ईमानदार हैं इसके लिए बेईमानी को भी जनगणना में shaमिल करना चाहिए ...इससे सबसे पहला
फायदा तो यह होगा कि यह अनुमान लगाने की सुविधा होगी कि योजनाओं में
कितनी रupya जनता तक पहूंच पा रहa है....चूंकि ईमानदारों का प्रतिshaत और जनता तक पहुंचे धन का प्रतिsaत समानुपाती होता है। इसलिए सरकार को यह मालूम हो जाने के बाद अलग से घोटालों
की राshi का प्रावधान कर सकेगी। इस जनगणना में मैं बेईमानों की ग्रेडिंग की अनुसंsha करता हूं ए.बी.सी.डी आदि में।
इसका अपना लाभ होगा। जिस पद के लिए जिस श्रेणी का बेईमान चाहिए, उस पद के लिए उसी श्रेणी के बेईमान की नियुक्ति की जा सकेगी।
जैसे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों के लिए, दूरसंचार मन्त्री के लिए आसानी से ‘ए’ ग्रेड के बेईमान ढूंढे जा सकेंगे। इसके साथ होshiयार और मूर्ख बेईमानों की भी अलग-अलग श्रेणी बनानी पड़ेंगी। होshiयार बेईमानों में उन्हे shaमिल किया जाना चाहिए जो घोटाला करने के बावजूद मामले को उजागर न होने देने में माहिर हों! आज देesh को ऐसे बेईमानों की सख्त जरूरत है, वैसे भी इसका सबसे ज्यादा लाभ स्वयं कांग्रेस को ही होगा क्योंकि उसके Shaसन में ही सबसे ज्यादा घोटाले होते हैं।
वैसे मूर्ख बेईमानों के मन्त्री बन जाने से प्रतिदिन ही कोई न कोई घोटाला प्रकाsh में आता जाता है जिससे सरकार की किरकिरी पर किरकिरी होती जा रही है। वैसे तो हमारी सरकारें किरण बेदी, सत्येन्द्र दूबे और अभयानन्द जैसे ईमानदारों को पहले से ही उनकी ईमानदारी के लिए दण्डित करती रही है...लेकिन जनगणना के बाद ईमानदारों को और भी आसानी से चिन्हित करके दण्डित किया जा सकेगा ...इसके साथ ही सरकार को उत्कृsट कोटि के बेईमानों के लिए बेईमान विभूshण, बेईमान भूshण, बेईमान श्री पुरुस्कार देने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे लाभ ये होगा कि ईमानदार अपनी ईमानदारी भरी व्यवस्था विरोधी गतिविधियों के प्रति हतोत्साहित होंगे और भारत को पूरी दुनियां में प्रथम shaत-प्रतिshaत बेईमान देesh
बनने का गौरव प्राप्त हो सकेगा। इसके साथ ही ईमानदारों के लिए कठोर कानून बनाया जाना चाहिए जिससे कोई भूलकर भी ईमानदारी पर चलने की गलती कर सके। लोकतन्त्र बहुमत से चलता है, बेईमानों को भी अपनी जनसंख्या के आधार पर सत्ता में भागीदारी मिले।
By : Harendar Singhal, Najafgarh
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
ताजमहल मकबरा नहीं बल्कि हिन्दूओं के अराध्य भगवान SHIव का ‘तजोमहालय’ था....
सारी दुनियां आजतक इस धोखे में है कि आगरा में स्थित ताजमहल को मुगल बादshaह Saहजहां ने बनवाया था।
तथ्यों से परे यह कोरा झूठ है...... यह उस वक्त के चापलूस इतिहासकारों द्वारा बादshaह Saहजहां की चापलूसी
में गढ़ी गई मुमताज और Saहजहां की प्रेम कहानी झूठी थी।
आगरा का ताजमहल वास्तव में हिन्दूओं के अराध्य देव भगवान Shiव का ‘तजोमहालय Shiवालय’ था! इस तजोमहालय Shiवालय की भव्य सुन्दरता को देखकर Shaहजहां ने अवैध तरीके से जयपुर के तत्कालीन महाराज से छीनकर कब्जा कर लिया.....और........
उस वक्त Shaहजहां के दरबारी लेखक ‘‘ मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ’’ ने अपने ‘‘बादshaहनामा’’ में मुगल बादshaह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से अधिक पन्नो में लिखा है.....जिसके खण्ड एक के पृsठ संख्या 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि ‘’Shaहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी जिसे मृत्यु के बाद बुरहानपुर (मध्यप्रदेSH) में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख 15. जमदी-उल-अउवल दिन Shuक्रवार के दिन अकबराबाद (आगरा) लाया गया....फिर उसे जयपुर के महाराजा जयसिंह से छीन ली गयी इस Shaनदार इमारत (तजोमहालय) में पुनः दफनाया गया। ‘‘मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल (तजोमहालय) से बेहद प्यार करते थे.. पर बादshaह के दवाब के आगे वह इसे देने को तैयार हो गये... इस बात की पुsटी के लिए आज भी राजा जयसिंह के गुप्त संग्रह में वे आदेsh रक्खे हुए हैं
जो Shaहजहां द्वारा ‘तजोमहालय’ भवन को समर्पित करने के लिए बादshaह ने राजा जयसिंह को दिए थे।
....यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम Shaसकों के समय में उनके कुनबे और दरबारियों के लोगों के मरने के बाद
उन्हे दफनाने के लिए....छीनकर कब्जे में लिए गए हिन्दू मन्दिरों और भवनो का प्रयोग किया जाता था।
हुमायूं , अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग जैसे मुगल बादshaह भी एैसे भवनों में ही दफनाये गए हैं....
प्रो. ओक ने भी अपनी खोज में लिखा कि ‘महल’ ‘ाब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक, किसी भी
मुस्लिम देesh में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता है...
यहां यह बात भी झूठी लगती है कि ‘महल’ ‘ाब्द मुमताज महल से लिया गया है
इसके लिए पहली बात यह है कि......Shaहजहां कि पत्नी का नाम मुमताज महल था ही नही ..बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-जमानी था... दूसरी बात ......कि किसी भी भवन का नामकरण.. किसी महिला के नाम पर रखने के लिए मुमताज का नाम ‘मुम’ को छोड़ ‘ताज’ का प्रयोग करने का क्या तुक है...जो नाम का आधा भाग है....! प्रो. ओक के अनुसार आज का ताजमहल हिन्दूओं के अराध्य स्थान तजोमहालय (भगवान Shiव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। इस तरह प्रो. ओक के अलावा भी दुनियां भर के अनेक इतिहासकार इसी बात प्रत्यक्ष समर्थन करते हैं। भगवान Shiव का मन्दिर (तजोमहालय) यानि आज का ताजमहल मुगल बादshaह के युग से लगभग 300 वर्S पहले से ही था, जो आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था।
--- न्यूयार्क के पुरात्वविद प्रोफेसर मर्विन मिलर ने 1985 में ताजमहल के यमुना की तरफ के दरवाजे की लकड़ी
पर जमी हुई कार्बन डेन्टिग के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि यह दरवाजा सन् 1359 ईस्वी के आस-पास
का बना हुआ है। जबकि उस वक्त मुगलों का नामों-निshaन भी नहीं था। और मुमताज की मृत्यु 1631 ईस्वी में
हुई थी। उसी वर्S 1631 में एक अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी के लेख में भी इस बात का पुरजोर समर्थन है कि
ताजमहल मुगल बादshaह के पहले अति महत्वपूर्ण भवन था।
झझझ इसी तरह एक फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी. जो औेरंगजेब के काल में भारत आया था और
10 year's तक रहा......उसने अपने विवरण में लिखा कि औरंगजेब काल में ही इस तरह का झूठ फैलाया गया कि ताजमहल तो Shaहजहां ने बनवाया था......
प्रोफेसर ओक ने अनेक आकृतियों और Shiल्प सम्बन्धी असंगताओं को जांच-परख कर साबित किया कि ताज
महल कोई मकबरा नही बल्कि हिन्दूओं का अराध्य Shiव मन्दिर ही है जिसे बल पूवर्क मुगल बादshaह Shaहजहां ने मकबरे का रूप दिया। आज भी ताजमहल के अनेको कमरे Shaहजहां के समय से ही बन्द पड़े हैं....जो आम जनता की पहुंच से परे हैं।
प्रोफेसर ओक के अनुसार हिन्दू मन्दिरों में ही पूजा व धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान Shiव की मूर्ति, त्रिshuल,
कलsh और ऊँ आदि होते हैं .....प्रयोग किये जाते हैं.... कहा जाता है कि ताजमहल में मुमताज की कब्र पर हर समय बूंद बूंद कर पानी टपकता रहता है.....यदि एैसा है तो पूरी दुनियां में किसी की भी कब्र पर बूंद बूंद पानी नही टपकाया जाता.......जबकि प्रत्येक हिन्दू Shiव मन्दिर में ही Shiव लिंग पर बूंद बूंद कर पानी टपकाने की
व्यवस्था की जाती है, फिर ताजमहल में मकबरे के उपर बूंद बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब है ???????
राजनीतिक भत्र्सना व देesh के मुस्लिम वोटो की लालच या उनके कोप भाजन के डर से इंदिरा गांधी ने प्रोफेसर
पी. एन. ओक को भयंकर परिणाम भुगतने की धमकी के साथ उनकी सभी पुस्तकों को तत्काल जब्त कर लिया
था। अगर प्रोफेसर पी. एन. ओक का ‘ताजमहल ’ अनुसंधान गलत था तो क्यों नही वर्तमान केन्द्र सरकार
ताजमहल के बन्द पड़े कमरों को संयुक्त राsट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए.....और अन्र्तराsट्रीय विsesyaज्ञों को छानबीन करने दे ....... जरा सोचिए !!!!!!!! इस संगमरमरी आर्कshaण वाले तजोमहालय (ताजमहल) को बनवाने का श्रेय बाहर से आने वाले हमलावर मुगल बादshaह Shaहजहां को क्यों ????
जबकि इसको बनवाने का सच्चा श्रेय और नाम तो जयपुर के महाराजा जयसिंह को जाना चाहिए .......
ताजमहल की छुपी हुई सच्चाई यही है कि ये मुमु का मकबरा नही बल्कि हिन्दू राजपूतों का अराध्य स्थल Shiवालय ‘तजोमहालय’ है ..........
Shiवधाम पर लिटाया..तो Shiव बूंदे आंसू बन गईं,
रूह तड़प-तड़प कर आजतक.. अगान्तुकों से लिपट रही......
तथ्यों से परे यह कोरा झूठ है...... यह उस वक्त के चापलूस इतिहासकारों द्वारा बादshaह Saहजहां की चापलूसी
में गढ़ी गई मुमताज और Saहजहां की प्रेम कहानी झूठी थी।
आगरा का ताजमहल वास्तव में हिन्दूओं के अराध्य देव भगवान Shiव का ‘तजोमहालय Shiवालय’ था! इस तजोमहालय Shiवालय की भव्य सुन्दरता को देखकर Shaहजहां ने अवैध तरीके से जयपुर के तत्कालीन महाराज से छीनकर कब्जा कर लिया.....और........
उस वक्त Shaहजहां के दरबारी लेखक ‘‘ मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ’’ ने अपने ‘‘बादshaहनामा’’ में मुगल बादshaह का सम्पूर्ण वृतांत 1000 से अधिक पन्नो में लिखा है.....जिसके खण्ड एक के पृsठ संख्या 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि ‘’Shaहजहां की बेगम मुमताज-उल-जमानी जिसे मृत्यु के बाद बुरहानपुर (मध्यप्रदेSH) में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके 6 माह बाद तारीख 15. जमदी-उल-अउवल दिन Shuक्रवार के दिन अकबराबाद (आगरा) लाया गया....फिर उसे जयपुर के महाराजा जयसिंह से छीन ली गयी इस Shaनदार इमारत (तजोमहालय) में पुनः दफनाया गया। ‘‘मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल (तजोमहालय) से बेहद प्यार करते थे.. पर बादshaह के दवाब के आगे वह इसे देने को तैयार हो गये... इस बात की पुsटी के लिए आज भी राजा जयसिंह के गुप्त संग्रह में वे आदेsh रक्खे हुए हैं
जो Shaहजहां द्वारा ‘तजोमहालय’ भवन को समर्पित करने के लिए बादshaह ने राजा जयसिंह को दिए थे।
....यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम Shaसकों के समय में उनके कुनबे और दरबारियों के लोगों के मरने के बाद
उन्हे दफनाने के लिए....छीनकर कब्जे में लिए गए हिन्दू मन्दिरों और भवनो का प्रयोग किया जाता था।
हुमायूं , अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग जैसे मुगल बादshaह भी एैसे भवनों में ही दफनाये गए हैं....
प्रो. ओक ने भी अपनी खोज में लिखा कि ‘महल’ ‘ाब्द अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक, किसी भी
मुस्लिम देesh में भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता है...
यहां यह बात भी झूठी लगती है कि ‘महल’ ‘ाब्द मुमताज महल से लिया गया है
इसके लिए पहली बात यह है कि......Shaहजहां कि पत्नी का नाम मुमताज महल था ही नही ..बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-जमानी था... दूसरी बात ......कि किसी भी भवन का नामकरण.. किसी महिला के नाम पर रखने के लिए मुमताज का नाम ‘मुम’ को छोड़ ‘ताज’ का प्रयोग करने का क्या तुक है...जो नाम का आधा भाग है....! प्रो. ओक के अनुसार आज का ताजमहल हिन्दूओं के अराध्य स्थान तजोमहालय (भगवान Shiव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है। इस तरह प्रो. ओक के अलावा भी दुनियां भर के अनेक इतिहासकार इसी बात प्रत्यक्ष समर्थन करते हैं। भगवान Shiव का मन्दिर (तजोमहालय) यानि आज का ताजमहल मुगल बादshaह के युग से लगभग 300 वर्S पहले से ही था, जो आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था।
--- न्यूयार्क के पुरात्वविद प्रोफेसर मर्विन मिलर ने 1985 में ताजमहल के यमुना की तरफ के दरवाजे की लकड़ी
पर जमी हुई कार्बन डेन्टिग के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि यह दरवाजा सन् 1359 ईस्वी के आस-पास
का बना हुआ है। जबकि उस वक्त मुगलों का नामों-निshaन भी नहीं था। और मुमताज की मृत्यु 1631 ईस्वी में
हुई थी। उसी वर्S 1631 में एक अंग्रेज भ्रमणकर्ता पीटर मुंडी के लेख में भी इस बात का पुरजोर समर्थन है कि
ताजमहल मुगल बादshaह के पहले अति महत्वपूर्ण भवन था।
झझझ इसी तरह एक फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम. डी. जो औेरंगजेब के काल में भारत आया था और
10 year's तक रहा......उसने अपने विवरण में लिखा कि औरंगजेब काल में ही इस तरह का झूठ फैलाया गया कि ताजमहल तो Shaहजहां ने बनवाया था......
प्रोफेसर ओक ने अनेक आकृतियों और Shiल्प सम्बन्धी असंगताओं को जांच-परख कर साबित किया कि ताज
महल कोई मकबरा नही बल्कि हिन्दूओं का अराध्य Shiव मन्दिर ही है जिसे बल पूवर्क मुगल बादshaह Shaहजहां ने मकबरे का रूप दिया। आज भी ताजमहल के अनेको कमरे Shaहजहां के समय से ही बन्द पड़े हैं....जो आम जनता की पहुंच से परे हैं।
प्रोफेसर ओक के अनुसार हिन्दू मन्दिरों में ही पूजा व धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान Shiव की मूर्ति, त्रिshuल,
कलsh और ऊँ आदि होते हैं .....प्रयोग किये जाते हैं.... कहा जाता है कि ताजमहल में मुमताज की कब्र पर हर समय बूंद बूंद कर पानी टपकता रहता है.....यदि एैसा है तो पूरी दुनियां में किसी की भी कब्र पर बूंद बूंद पानी नही टपकाया जाता.......जबकि प्रत्येक हिन्दू Shiव मन्दिर में ही Shiव लिंग पर बूंद बूंद कर पानी टपकाने की
व्यवस्था की जाती है, फिर ताजमहल में मकबरे के उपर बूंद बूंद कर पानी टपकाने का क्या मतलब है ???????
राजनीतिक भत्र्सना व देesh के मुस्लिम वोटो की लालच या उनके कोप भाजन के डर से इंदिरा गांधी ने प्रोफेसर
पी. एन. ओक को भयंकर परिणाम भुगतने की धमकी के साथ उनकी सभी पुस्तकों को तत्काल जब्त कर लिया
था। अगर प्रोफेसर पी. एन. ओक का ‘ताजमहल ’ अनुसंधान गलत था तो क्यों नही वर्तमान केन्द्र सरकार
ताजमहल के बन्द पड़े कमरों को संयुक्त राsट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए.....और अन्र्तराsट्रीय विsesyaज्ञों को छानबीन करने दे ....... जरा सोचिए !!!!!!!! इस संगमरमरी आर्कshaण वाले तजोमहालय (ताजमहल) को बनवाने का श्रेय बाहर से आने वाले हमलावर मुगल बादshaह Shaहजहां को क्यों ????
जबकि इसको बनवाने का सच्चा श्रेय और नाम तो जयपुर के महाराजा जयसिंह को जाना चाहिए .......
ताजमहल की छुपी हुई सच्चाई यही है कि ये मुमु का मकबरा नही बल्कि हिन्दू राजपूतों का अराध्य स्थल Shiवालय ‘तजोमहालय’ है ..........
Shiवधाम पर लिटाया..तो Shiव बूंदे आंसू बन गईं,
रूह तड़प-तड़प कर आजतक.. अगान्तुकों से लिपट रही......
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
बाबर कोई मसीहा नही था।
अयोध्या के विवादित परिसर के मालिकाना हक के फैेंसले को न्यायालय
ने सुरक्षित रखते हुए 24 सितम्बर को सुनाने की बात कही थी। फेंैसला
आने से पहले ही सरकार ने दे’ा की जनता को डराना ‘ाुरू कर दिया
कि इस फैेंसले के आने के बाद कहीं कुछ भी हो सकता है। स्वयं दे’ा
के गृह मन्त्री पी. चिदम्बरम टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को संयम
बरतने की सलाह देते नजर आए। जबकि दोनों पक्ष के प्रतिनिधियों द्वारा
अदालत का फेैंसला मान्य होगा कि बार-बार घो”ाणाएं होती आ रही हैं।
कहीं भी तनाव जैसी बात ही नही थी, पर सरकार ने स्वयं दे’ा की
जनता को इस मामले को संवेदन’ाील बता-बताकर संवेदन’ाील बना
दिया है। सरकार की पहल से अब लगता है कि बाबर के वं’ाज
अक्रान्ता का मकबरा या मस्जिद बनाकर ही दम लेंगे, जबकि हिन्दू भी
रामलला की एक इंच भूमि छोड़ने को तैयार नही। फेैंसला जो भी हो,
इसे सरकार कहां तक अमल करवा पाती है यह देखने योग्य बात होगी!
आज चारों तरफ यही सुगबुगाहट है कि अपने वोटों की खातिर सरकार
रामलला के फेैंसले को ठंडे बस्ते में न डाल दे ?
अयोध्या में मस्जिद/ मकबरा बनेगा या राम मन्दिर ? मुसलमान चीख-
चीख कर कह रहा है कि निर्णय मुसलमानों के पक्ष में होना चाहिए,
क्योंकि वे बेचारे हैं, अल्पसंख्यक हैं, कांग्रेस के साथी हैं। उनकी
आस्थाएं हिन्दुओं की आस्थाओं से अधिक महत्व की हैं। मुझे मुसलमानों
की सोच पर आ’चर्य होता है कि कैसे एक क्रूर विदे’ाी आक्रमणकारी
का मकबरा या मस्जिद बनाने के नाम पर अपना सिर पीट रहे हैं। हाय
तौबा मचा रहे हैं। एक बड़ा सवाल है कि - क्या अत्याचारियों की भी
पूजा होनी चाहिए ? क्या अत्याचारियों के स्मारकों के लिए अच्छे लोगों
के स्मारकों को तोड़ देना चाहिए? ( कथित बाबरी मस्जिद भी श्रीराम
लला के मन्दिर को तोड़कर बनाई गई थी ), क्या लोगों की हत्या
करने वाला भी किसी वर्ग वि’ो”ा का आदर्’ा हो सकता है ? रावण
प्रकाण्ड पंडित था, लेकिन बहुसंख्यक हिन्दु समाज का आदर्’ा नहीं। कंस
बहुत ‘ाक्ति’ााली था, लेकिन वह भी कभी हिन्दुओं का सिरोधार्य नहीं
रहा। हिन्दुओं ने कभी भी अत्याचारियों के मन्दिर या प्रतीकों के निर्माण
की मांग नही की। फिर एक अत्याचारी, अनाचारी, विदे’ाी आक्रमणकारी
का मकबरा या मस्जिद क्यों बननी चाहिए ? इतिहास में दर्ज है कि
काबूल - गांधार दे’ा, जो आज अफगानिस्तान की राजधानी है। 10वीं
‘ाताब्दी के अंत तक गांधार और प’िचमी पंजाब पर लाहौर के हिन्दू
’ााही राजवं’ा की हकूमत थी। सन् 990 ईसवी में काबुल पर तुर्क के
मुसलमानों का अधिकार हो गया, फिर उन्ही तुर्क मुसलमानों ने मेहमूद
गजनवी के नेतृत्व में काबुल को आधार बनाकर भारत पर बार-बार हमले
किए। उसके बाद 16वीं ‘ाताब्दी में मध्य ए’िाया के एक छोटे से मुगल
( मंगोल ) ‘ाासक बाबर ने आकर काबूल पर अधिकार जमा लिया।
वहां से वह आगे बढ़ता हुआ भारत आ गया और सन् 1526 में पानीपत
की पहली लड़ाई में विजयी हो कर दिल्ली का मालिक बन बैठा। पर
उसका दिल दिल्ली में नही लगा, और वह चार साल बाद 1530 ईसवी
में मर गया। उसके ‘ाव को काबूल ले जाकर दफनाया गया। इसलिए
उसका मकबरा भी वहीं है। आज उस मकबरे की हालत जीर्ण‘ाीर्ण है।
उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नही है। बलराज मधोक ने अपनी
पुस्तक ‘‘जिन्दगी का सफर-2’’ में लिखा है कि जब मैं काबूल में बाबर
के मकबरे को देखने गया तो उस खस्ता हाल मकबरे की हालत देखकर
वहां के लोगों से पूछा कि इस मकबरे की हालत एैसी क्यों है?
तो वहां के एक व्यक्ति ने बलराज मधोक को अंग्रेजी में जवाब दिया था
कि ‘क्मउदमक वितमपहदमत ूील ेीवनसक ूम उंपदजंपद ीपे
उंनेंसमनउण्’’ इसका मायने कि इस विदे’ाी हमलावर के मकबरे
का रखरखाव और देखभाल हम क्यों करें? काबूल के लोगों के लिए
भी वह विदे’ाी ही था। वह छोटे से फरगान राज्य से आया था। परन्तु
यह कैसा दुर्भाग्य है कि जिसे काबूल के लोग विदे’ाी आक्रमणकारी,
आततायी मानते हैं, उसे हिन्दुस्तान की सरकार और भाड़े के बुद्धिजीवी
हीरो मानते हैं ? और उस बाबर के द्वारा श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर को
तोड़ कर बनाई गई अवैध बाबर की बाबरी मस्जिद को बनाए रखने में
अपनी ‘ाान और बड़प्पन मानते है, जबकि उसका मालिकाना हक बहु
संख्यक हिन्दुओं का है। फेंैसला भी हिन्दुओं के हक में ही आना चाहिए।
क्योंकि यहां राम का जन्म हुआ था। यहां रामलला का भव्य मन्दिर था।
अयोध्या राम की है, उसे पहले बाबर ने तोड़ा। उसके तोड़ने की सजा
भी आज पुनः बाबरी मस्जिद की मांग करने वालों को दी जानी चाहिए।
जिन्होने इसके नाम पर वर्”ाों तक दे’ा में अस्थिरता के साथ-साथ डर
और दह’ात का माहौल बनाये रखा है। .
ने सुरक्षित रखते हुए 24 सितम्बर को सुनाने की बात कही थी। फेंैसला
आने से पहले ही सरकार ने दे’ा की जनता को डराना ‘ाुरू कर दिया
कि इस फैेंसले के आने के बाद कहीं कुछ भी हो सकता है। स्वयं दे’ा
के गृह मन्त्री पी. चिदम्बरम टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को संयम
बरतने की सलाह देते नजर आए। जबकि दोनों पक्ष के प्रतिनिधियों द्वारा
अदालत का फेैंसला मान्य होगा कि बार-बार घो”ाणाएं होती आ रही हैं।
कहीं भी तनाव जैसी बात ही नही थी, पर सरकार ने स्वयं दे’ा की
जनता को इस मामले को संवेदन’ाील बता-बताकर संवेदन’ाील बना
दिया है। सरकार की पहल से अब लगता है कि बाबर के वं’ाज
अक्रान्ता का मकबरा या मस्जिद बनाकर ही दम लेंगे, जबकि हिन्दू भी
रामलला की एक इंच भूमि छोड़ने को तैयार नही। फेैंसला जो भी हो,
इसे सरकार कहां तक अमल करवा पाती है यह देखने योग्य बात होगी!
आज चारों तरफ यही सुगबुगाहट है कि अपने वोटों की खातिर सरकार
रामलला के फेैंसले को ठंडे बस्ते में न डाल दे ?
अयोध्या में मस्जिद/ मकबरा बनेगा या राम मन्दिर ? मुसलमान चीख-
चीख कर कह रहा है कि निर्णय मुसलमानों के पक्ष में होना चाहिए,
क्योंकि वे बेचारे हैं, अल्पसंख्यक हैं, कांग्रेस के साथी हैं। उनकी
आस्थाएं हिन्दुओं की आस्थाओं से अधिक महत्व की हैं। मुझे मुसलमानों
की सोच पर आ’चर्य होता है कि कैसे एक क्रूर विदे’ाी आक्रमणकारी
का मकबरा या मस्जिद बनाने के नाम पर अपना सिर पीट रहे हैं। हाय
तौबा मचा रहे हैं। एक बड़ा सवाल है कि - क्या अत्याचारियों की भी
पूजा होनी चाहिए ? क्या अत्याचारियों के स्मारकों के लिए अच्छे लोगों
के स्मारकों को तोड़ देना चाहिए? ( कथित बाबरी मस्जिद भी श्रीराम
लला के मन्दिर को तोड़कर बनाई गई थी ), क्या लोगों की हत्या
करने वाला भी किसी वर्ग वि’ो”ा का आदर्’ा हो सकता है ? रावण
प्रकाण्ड पंडित था, लेकिन बहुसंख्यक हिन्दु समाज का आदर्’ा नहीं। कंस
बहुत ‘ाक्ति’ााली था, लेकिन वह भी कभी हिन्दुओं का सिरोधार्य नहीं
रहा। हिन्दुओं ने कभी भी अत्याचारियों के मन्दिर या प्रतीकों के निर्माण
की मांग नही की। फिर एक अत्याचारी, अनाचारी, विदे’ाी आक्रमणकारी
का मकबरा या मस्जिद क्यों बननी चाहिए ? इतिहास में दर्ज है कि
काबूल - गांधार दे’ा, जो आज अफगानिस्तान की राजधानी है। 10वीं
‘ाताब्दी के अंत तक गांधार और प’िचमी पंजाब पर लाहौर के हिन्दू
’ााही राजवं’ा की हकूमत थी। सन् 990 ईसवी में काबुल पर तुर्क के
मुसलमानों का अधिकार हो गया, फिर उन्ही तुर्क मुसलमानों ने मेहमूद
गजनवी के नेतृत्व में काबुल को आधार बनाकर भारत पर बार-बार हमले
किए। उसके बाद 16वीं ‘ाताब्दी में मध्य ए’िाया के एक छोटे से मुगल
( मंगोल ) ‘ाासक बाबर ने आकर काबूल पर अधिकार जमा लिया।
वहां से वह आगे बढ़ता हुआ भारत आ गया और सन् 1526 में पानीपत
की पहली लड़ाई में विजयी हो कर दिल्ली का मालिक बन बैठा। पर
उसका दिल दिल्ली में नही लगा, और वह चार साल बाद 1530 ईसवी
में मर गया। उसके ‘ाव को काबूल ले जाकर दफनाया गया। इसलिए
उसका मकबरा भी वहीं है। आज उस मकबरे की हालत जीर्ण‘ाीर्ण है।
उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नही है। बलराज मधोक ने अपनी
पुस्तक ‘‘जिन्दगी का सफर-2’’ में लिखा है कि जब मैं काबूल में बाबर
के मकबरे को देखने गया तो उस खस्ता हाल मकबरे की हालत देखकर
वहां के लोगों से पूछा कि इस मकबरे की हालत एैसी क्यों है?
तो वहां के एक व्यक्ति ने बलराज मधोक को अंग्रेजी में जवाब दिया था
कि ‘क्मउदमक वितमपहदमत ूील ेीवनसक ूम उंपदजंपद ीपे
उंनेंसमनउण्’’ इसका मायने कि इस विदे’ाी हमलावर के मकबरे
का रखरखाव और देखभाल हम क्यों करें? काबूल के लोगों के लिए
भी वह विदे’ाी ही था। वह छोटे से फरगान राज्य से आया था। परन्तु
यह कैसा दुर्भाग्य है कि जिसे काबूल के लोग विदे’ाी आक्रमणकारी,
आततायी मानते हैं, उसे हिन्दुस्तान की सरकार और भाड़े के बुद्धिजीवी
हीरो मानते हैं ? और उस बाबर के द्वारा श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर को
तोड़ कर बनाई गई अवैध बाबर की बाबरी मस्जिद को बनाए रखने में
अपनी ‘ाान और बड़प्पन मानते है, जबकि उसका मालिकाना हक बहु
संख्यक हिन्दुओं का है। फेंैसला भी हिन्दुओं के हक में ही आना चाहिए।
क्योंकि यहां राम का जन्म हुआ था। यहां रामलला का भव्य मन्दिर था।
अयोध्या राम की है, उसे पहले बाबर ने तोड़ा। उसके तोड़ने की सजा
भी आज पुनः बाबरी मस्जिद की मांग करने वालों को दी जानी चाहिए।
जिन्होने इसके नाम पर वर्”ाों तक दे’ा में अस्थिरता के साथ-साथ डर
और दह’ात का माहौल बनाये रखा है। .
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